गोमिया। जिस मिट्टी के घर में रहकर गोमिया क्षेत्र के एक होनहार फुटबॉल खिलाड़ी ने अपनी जिंदगी के तमाम सपनों को पंख दिए, आखिरकार उसी मिट्टी में वह हमेशा के लिए मिल गया। गोमिया प्रखंड के खम्हरा गांव निवासी 45 वर्षीय कजरा मुर्मू शुक्रवार की रात अपना अंतिम फुटबॉल मैच खेलते-खेलते दुनिया को अलविदा कह गए। मैदान में खेल के दौरान अचानक विपक्षी साथी खिलाड़ी से हुई टक्कर के बाद वह जमीन पर गिर पड़े। इसके बाद उन्हें देर रात डीवीसी अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उनकी मौत की पुष्टि कर दी।

कजरा मुर्मू की अचानक हुई मौत की खबर मिलते ही खम्हरा गांव समेत आसपास के इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। जिस खिलाड़ी ने वर्षों तक फुटबॉल मैदान पर अपने खेल से लोगों का मनोरंजन किया और अनेक मुकाबलों में अपनी टीम को जीत दिलाई, उसकी इस तरह मैदान से ही अंतिम विदाई ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया।
डे-नाइट ग्रामीण फुटबॉल टूर्नामेंट में खेल रहे थे कजरा
बताया जाता है कि शुक्रवार की रात बीटीपीएस क्षेत्र में बजरंग क्लब नया बस्ती की ओर से डे-नाइट ग्रामीण फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन किया गया था। प्रतियोगिता के दौरान हांसदा 11 और टुडू बीबीआर के बीच मुकाबला चल रहा था। कजरा मुर्मू हांसदा 11 की टीम की ओर से मैदान में उतरे थे।
मैच बेहद रोमांचक स्थिति में था और दोनों टीमें एक-एक गोल की बराबरी पर थीं। दोनों पक्षों के खिलाड़ी दूसरे गोल की तलाश में लगातार आक्रमण कर रहे थे। इसी दौरान गेंद को लेकर आगे बढ़ते समय कजरा मुर्मू की विपक्षी खिलाड़ी से जोरदार टक्कर हो गई। टक्कर के बाद वह मैदान में ही गिर पड़े।
मैदान पर कजरा को गिरते देख साथी खिलाड़ियों और वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। आनन-फानन में उन्हें उपचार के लिए डीवीसी अस्पताल ले जाया गया। लेकिन चिकित्सकों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। खेल के मैदान में जिस खिलाड़ी की पहचान उसकी ऊर्जा, जुझारूपन और खेल भावना से होती थी, उसकी अचानक मौत की खबर ने सभी को झकझोर दिया।

जिस मैदान के लिए खेला, वहीं से उठी अंतिम विदाई
कजरा मुर्मू के लिए फुटबॉल केवल खेल नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने के बावजूद उन्होंने फुटबॉल के प्रति अपना जुनून कभी कम नहीं होने दिया। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने वर्षों तक स्थानीय स्तर पर फुटबॉल खेला और अपनी प्रतिभा के दम पर अलग पहचान बनाई।
बताया जाता है कि उन्हें खेल के दौरान मिले मेडल, शील्ड और मोमेंटो की संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें रखने के लिए घर में पर्याप्त जगह तक नहीं है। मिट्टी के साधारण घर में रहने वाले कजरा की असली संपत्ति यही पुरस्कार और उनकी खेल उपलब्धियां थीं। उनके लिए ये सिर्फ ट्रॉफियां नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और खेल के प्रति समर्पण की निशानी थीं।

मिट्टी के घर में रहता है पूरा परिवार
कजरा मुर्मू का परिवार खम्हरा बस्ती में एक साधारण मिट्टी के कच्चे मकान में रहता है। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद सामान्य है। उनकी मां तालो मांझी बुजुर्ग हैं और पेंशन पर आश्रित हैं। पत्नी मोनिका देवी घरेलू कार्य करती हैं। कजरा के दो बच्चे हैं—बड़ी बेटी मिली मुर्मू और पुत्र निखिल मुर्मू, जो अभी पढ़ाई कर रहे हैं।
परिवार के लिए कजरा केवल घर चलाने वाले सदस्य ही नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य का सहारा और मां का संबल भी थे। उनकी अचानक मौत ने परिवार के सामने भावनात्मक संकट के साथ-साथ भविष्य की चिंता भी खड़ी कर दी है।

घर में पसरा मातम, अपनों का रो-रोकर बुरा हाल
कजरा मुर्मू की मौत की खबर के बाद उनके घर में मातम पसरा हुआ है। पत्नी मोनिका देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। बेटी मिली और पुत्र निखिल अपने पिता को खोने के गम में बेसुध हैं। बुजुर्ग मां तालो मांझी की आंखों से आंसू थम नहीं रहे हैं।
घर के बाहर पड़ोस की महिलाएं, रिश्तेदार और परिचित जुटे हुए हैं। हर तरफ सिसकियां सुनाई दे रही हैं। जो घर कुछ घंटे पहले तक एक फुटबॉल खिलाड़ी के मैच खेलने और लौटने की उम्मीद में था, वहां अब मातम का सन्नाटा है।
ग्रामीणों के मुताबिक, कजरा का स्वभाव मिलनसार था और वह अपने साथी खिलाड़ियों के बीच काफी लोकप्रिय थे। खेल के मैदान में वह जिस उत्साह के साथ उतरते थे, उसी तरह गांव के लोगों के साथ भी सहजता से घुल-मिल जाते थे। उनकी असामयिक मौत से साथी खिलाड़ी भी गहरे सदमे में हैं।

जनप्रतिनिधियों और साथी खिलाड़ियों ने जताया शोक
कजरा मुर्मू के निधन पर खम्हरा पंचायत के मुखिया बंटी उरांव, सियारी पंचायत के मुखिया रामबृक्ष मुर्मू, कर्री खुर्द पंचायत के मुखिया सोनाराम मुर्मू, समाजसेवी पिंटू पासवान, शेरा यादव, सोनाराम बेसरा, साथी खिलाड़ी मंटू पासवान, ओम प्रकाश ठाकुर और दिलीप यादव सहित अन्य लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
साथी खिलाड़ियों ने कहा कि कजरा मुर्मू जैसे खिलाड़ी का इस तरह अचानक चले जाना स्थानीय फुटबॉल जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने वर्षों तक खेल के प्रति समर्पण बनाए रखा और आर्थिक परेशानियों के बावजूद मैदान से अपना नाता नहीं तोड़ा।

पुरस्कारों से भरा घर, लेकिन परिवार के सामने अब भविष्य की चिंता
कजरा मुर्मू के घर में रखे मेडल, शील्ड और मोमेंटो उनकी खेल यात्रा की कहानी बयां करते हैं। हर पुरस्कार के पीछे किसी न किसी मैदान की कहानी है, किसी मुकाबले की याद है और उनकी मेहनत जुड़ी हुई है। लेकिन आज वही पुरस्कार परिवार के लिए कजरा की यादों का सहारा बन गए हैं।
एक तरफ घर में उनकी उपलब्धियों की निशानियां हैं, तो दूसरी तरफ परिवार के सामने रोजमर्रा की जिंदगी और बच्चों की पढ़ाई को लेकर भविष्य की चिंता खड़ी हो गई है। कजरा की मौत ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए खेल के साथ-साथ उनके परिवार की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था कितनी जरूरी है।
कजरा मुर्मू मैदान में अपना अंतिम मैच खेलकर चले गए, लेकिन उनके पीछे छूट गए मेडल, शील्ड, मोमेंटो और उनके चाहने वालों की यादें उनकी फुटबॉल यात्रा की गवाही देती रहेंगी। मिट्टी के उस छोटे से घर में अब उनकी आवाज नहीं गूंजेगी, लेकिन वहां रखी उनकी ट्रॉफियां लंबे समय तक यह बताती रहेंगी कि इसी साधारण घर से एक ऐसा खिलाड़ी निकला था, जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा फुटबॉल के मैदान को समर्पित कर दिया था।
















