विशाल अग्रवाल
गोमिया: गोमिया प्रखंड अंतर्गत आने वाले झुमरा, लुगु और जिनगा पहाड़ से लगे जंगलों में बढ़ती इंसानी घुसपैठ और माफिया राज ने प्रकृति का संतुलन इस कदर बिगाड़ दिया है कि अब इंसान और जानवर, दोनों ही मौत के साये में जीने को मजबूर हैं। प्रखंड के तुलबुल में हाल ही में देखने को मिला एक तरफ लकड़ी माफिया वन विभाग की टीम पर जानलेवा हमले कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपने घर (जंगल) उजड़ने से नाराज गजराज ग्रामीणों पर काल बनकर टूट रहे हैं।

माफियाओं का दुस्साहस: वन रक्षक ही असुरक्षित
जंगलों में इन दिनों ‘लकड़ी माफियाओं’ का राज चल रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकने जाने वाली वन विभाग की टीम पर हमले हो रहे हैं। माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे टांगी, आरी जैसे घातक हथियारों और संगठित गिरोह के दम पर सरकारी तंत्र को चुनौती दे रहे हैं। बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी के चक्कर में जंगल के जंगल साफ किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ
पत्थर खनन और धमाकों से थर्राया जंगल
सिर्फ पेड़ों की कटाई ही नहीं, बल्कि जंगलों के भीतर नदी नालों में विस्फोटक लगाकर किया जा रहा अवैध पत्थर खनन भी तबाही का बड़ा कारण है। पत्थर माफिया विस्फोटक लगाकर पत्थर का उत्खनन कर क्रशरों में दाल रहे हैं जहां रातभर पत्थरों को क्रशकर (पिसाई) गिट्टी का रूप दिया जा रहा है। रातभर क्रशरों की तीव्र आवाजें और भारी पत्थरों को ड्रील कर विस्फोटों से उड़ाने की गूंज और इंसानी हलचल ने हाथियों के प्राकृतिक गलियारों (Corridors) को छिन्न-भिन्न कर दिया है। शांत रहने वाला यह विशालकाय प्राणी मजबूरन अब हिंसक हो उठा है।

वन विभाग के टीम पर माफियाओं के हमले का ताजा उदाहरण, 11 पर केस दर्ज
लकड़ी माफियाओं द्वारा वाब विभाग की टीम पर हमले का ताजा उदाहरण गोमिया प्रखंड के तुलुबुल का है, जहां 26 फरवरी की रात को माफियों के एक संगठित गिरोह ने वन विभाग द्वारा पकड़े गये लकड़ी तस्करों को छुड़ाने के लिए वन विभाग की टीम पर हमला कर दिया। जिसमें वन विभाग के (QRT) टीम के 5 कर्मचारी देवनाथ महतो, उपेन्द्र टुडू, काली रजवार, जलेश्वर मुर्मू व सपन लाल बेदिया घायल हो गये वहीं माफिया गिरोह ने गश्ती वाहनों को भी ईंट पत्थरों से क्षतिग्रस्त कर दिया था। जिसके प्रतिक्रिया में वन विभाग ने तुलबुल के भगलू प्रजापति, सुभाष प्रजापति, अजय प्रजापति, संदीप प्रजापति, शंभू प्रजापति, राहुल प्रजापति, सुभाष प्रजापति, बनवारी प्रजापति, लालबिहारी प्रजापति सहित 11 नामजद (महिलाएं भी शामिल) व कई अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज कराया था

हाथियों का कोहराम: एक दर्जन से ज्यादा मौतें
जंगल में अपनी सुरक्षा और भोजन के अभाव के कारण हाथी अब रिहाइशी इलाकों का रुख कर रहे हैं। पिछले कुछ समय में हाथी के हमलों में केवल गोमिया प्रखंड क्षेत्र के तुलबुल, ललपनिया, जगेश्वर, गांगपुर, महुआटांड, बड़की सीधाबारा, बड़की पुन्नू, कुंदा, पचमो आदि गांवों में एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। रात होते ही ग्रामीण इलाकों में दहशत फैल जाती है। ग्रामीण अपनी फसलों और जान को बचाने के लिए रात भर जागने को मजबूर हैं, लेकिन वन विभाग और प्रशासन के पास इस समस्या का कोई ठोस समाधान नजर नहीं आ रहा।

महुआ चुनने के लिए लगाई गई आग भी बड़ा कारण
वर्तमान में जंगलों में आग और भारी धुएं के कारण हाथियों का प्राकृतिक रहन-सहन और शांति प्रभावित हो रही है। आग लगने से जंगल में चारे और पानी की कमी हो रही है, जिससे हाथी चिड़चिड़े और गुस्सैल हो रहे हैं। हाथियों को महुआ के फूलों की खुशबू और स्वाद बहुत पसंद है। वे इसे खाने के लिए आबादी और सड़कों के करीब पहुंच जाते हैं, जिससे इंसानों से मुठभेड़ की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण हुआ कि रविवार को जगेश्वर गाँव में महुआ चुनने गई महिला ठगनी देवी को हाथियों ने हमला कर मार डाला। आग के कारण हाथियों के दल जंगलों से निकलकर गांवों और रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं।
असली विलेन कौन ?
जंगल या प्रकृतिक के जानकारों का मानना है कि यह स्थिति रातों-रात पैदा नहीं हुई है। इसके पीछे अवैध इंसानी घुसपैठ: जंगलों के बीचों-बीच बस्तियां और अवैध कब्जे। संसाधनों की लूट: माफिया द्वारा जंगलों का दोहन। सुरक्षा में चूक: पत्थर खनन के लिए हो रहे हेवी विस्फोटकीय धमाके हाथियों को विचलित और उग्र बना रहे हैं। हाथियों से इंसानों को होने वाली क्षति और उसकी आवाज तो आसानी से सरकार, शासन और प्रशासन तक पहुंच जाता है लेकिन मूक हाथी अपनी परेशानी कैसे और किससे कहे ?
निष्कर्ष:
यदि समय रहते जंगलों में माफियाओं के खिलाफ कड़ा एक्शन नहीं लिया गया और हाथियों के गलियारों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो यह ‘मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट’ आने वाले दिनों में और भी भयावह रूप ले सकता है। ग्रामीण अब सवाल लगातार पूछ रहे हैं—आखिर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
एक बड़ा आरोप यह भी
वन विभाग के कर्मचारियों और माफियाओं के बीच कथित सांठगांठ एक गंभीर मुद्दा है, जो हाल के समय में हाथी-मानव संघर्ष को बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। लकड़ी माफिया और अवैध पत्थर खनन गतिविधियों के कारण हाथियों के प्राकृतिक गलियारे (corridors) और उनके भोजन के स्रोत नष्ट हो रहे हैं। जब वन कर्मी इन अवैध गतिविधियों को रोकने के बजाय कथित तौर पर उनसे हाथ मिला लेते हैं, तो हाथी भोजन और पानी की तलाश में मजबूर होकर रिहायशी इलाकों का रुख करते हैं।














