गोमिया। बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत आईईएल थाना क्षेत्र के चीतु, बरतुआ और बगलतवा गांव के आसपास कोनार नदी में कथित रूप से बड़े पैमाने पर अवैध पत्थर उत्खनन किए जाने का मामला सामने आया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नदी के प्रवाह को प्रभावित कर नदी के बीच और आसपास से पत्थर निकाले जा रहे हैं। इस गतिविधि के कारण कोनार नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ने की बात कही जा रही है।
स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों के अनुसार, आईईएल थाना क्षेत्र से सटे कोनार नदी के हिस्से में लंबे समय से पत्थर उत्खनन का कार्य जारी है। आरोप है कि कई स्थानों पर नदी के प्रवाह को मोड़कर विस्फोटक लगाकर पत्थरों का उत्खनन किया जाता है। इसके बाद निकाले गए पत्थरों को आसपास संचालित क्रशरों तक पहुंचाया जाता है, जहां उनका उपयोग गिट्टी एवं अन्य निर्माण सामग्री तैयार करने में किया जाता है।

नदी के दोनों किनारों में हो रहा पत्थर उत्खनन
बताया जाता है कि बरसात के कुछ महीनों को छोड़ दिया जाए तो वर्ष के अधिकांश समय कोनार नदी क्षेत्र में पत्थर उत्खनन का कार्य चलता रहता है। स्थानीय लोगों का दावा है कि नदी के दोनों साइड बड़े पैमाने पर पत्थर निकाल लिए जाने के कारण कई जगहों पर नदी का स्वरूप बदल गया है। कहीं गहरे गड्ढे बन गए हैं तो कहीं नदी का प्रवाह संकरा होकर नाले जैसा दिखाई देने लगा है। अवैध पत्थर खनन के कारण नदी का मूल स्वरुप बदलकर उसकी चौड़ाई 250-300 मीटर हो गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पत्थर तोड़ने के लिए कई स्थानों पर विस्फोट किए जाते हैं। हालांकि विस्फोटकों के इस्तेमाल से संबंधित इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभागों की जांच के बाद ही हो सकती है। ग्रामीणों के अनुसार, ब्लास्टिंग के दौरान तेज आवाज के साथ पत्थरों को तोड़ा जाता है, जिससे आसपास रहने वाले लोगों में भय का माहौल रहता है।
नदी पार कर स्कूल जाने वाले बच्चों को भी परेशानी
स्थानीय लोगों ने बताया कि कोनार नदी उनके लिए केवल जलस्रोत ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के आवागमन का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। आसपास के गांवों के लोग नदी पार कर एक-दूसरे के क्षेत्र में आते-जाते हैं। वहीं, कई स्कूली बच्चे भी नदी पार कर विद्यालय पहुंचते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि नदी में जगह-जगह गहरे गड्ढे और असमान रास्ते बन जाने के कारण नदी पार करना पहले की तुलना में अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है। ब्लास्टिंग की आवाज और पत्थर उत्खनन की गतिविधियों के कारण भी लोगों को परेशानी होती है।
दो दशक से अधिक समय से खनन का दावा
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, इस क्षेत्र में पत्थर उत्खनन का सिलसिला पिछले दो दशक से भी अधिक समय से चल रहा है। नदी के दोनों किनारों पर आधा दर्जन से अधिक क्रशर संचालित होने की बात कही जा रही है। आरोप है कि नदी से निकाले गए पत्थरों को इन क्रशरों में लाकर गिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री तैयार की जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि पत्थर माफियाओं द्वारा एनजीटी के नियमों को ताख पर रखकर दिन-रात क्रशर संचालन के कारण आसपास के इलाके में धूल-कण का प्रभाव भी बढ़ गया है। इससे खेतों, पेड़-पौधों और आसपास रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन पर असर पड़ने की बात कही जा रही है।
खनन लीज को लेकर भी उठ रहे सवाल
मामले में ग्रामीणों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि गोमिया प्रखंड क्षेत्र में पत्थर खनन के लिए किन-किन व्यक्तियों या संस्थाओं को वैध खनन लीज अथवा अनुमति दी गई है। विभागीय स्तर पर किन क्षेत्रों में खनन की अनुमति है और प्राकृतिक नदी से क्रशरों की निर्धारित सीमा क्या है, इसे लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि किसी क्षेत्र में वैध खनन की अनुमति है तो भी निर्धारित क्षेत्र और पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप ही खनन होना चाहिए। वहीं, यदि नदी के प्रवाह क्षेत्र अथवा प्रतिबंधित क्षेत्र में खनन किया जा रहा है तो इसकी जांच कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
कोनार नदी के प्राकृतिक स्वरूप पर खतरा
कोनार नदी बोकारो और हजारीबाग जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों से होकर बहती है और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए महत्वपूर्ण जलस्रोत मानी जाती है। नदी पर स्थानीय लोगों की विभिन्न जरूरतें निर्भर हैं। ऐसे में नदी के भीतर से लगातार पत्थर निकाले जाने से इसके प्राकृतिक स्वरूप पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि नदी की तलहटी और किनारों से बड़े पैमाने पर खनिज निकालने से नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है। इससे जलधारा के प्रवाह, भू-जल पुनर्भरण और नदी के पारिस्थितिक तंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
प्रशासनिक मिलीभगत का भी लगाया आरोप
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि लंबे समय से चल रहे कथित अवैध उत्खनन के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से खनन कारोबार करने वालों के हौसले बढ़े हुए हैं। कुछ लोगों ने प्रशासन, वन विभाग और खनन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।
हालांकि, इन विभागों की कथित मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोगों के काम करने का दावा
स्थानीय लोगों के अनुसार, पत्थर उत्खनन और उसे जमा करने के काम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिला-पुरुष मजदूर लगाए जाते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कई स्थानों पर करीब 40 से 50 महिला-पुरुष इस कार्य में लगे दिखाई देते हैं। इसके बाद पत्थरों को क्रशर तक पहुंचाया जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह कार्य बिना वैध अनुमति अथवा निर्धारित पर्यावरणीय नियमों के विपरीत हो रहा है तो संबंधित विभाग को तत्काल स्थल निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की जांच करनी चाहिए।
संयुक्त जांच की मांग
स्थानीय ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, खनन विभाग और वन विभाग से संयुक्त रूप से कोनार नदी के संबंधित हिस्सों का स्थल निरीक्षण कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि निरीक्षण के दौरान यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन स्थानों पर खनन की अनुमति है, कितने क्षेत्र में लीज स्वीकृत है और नदी क्षेत्र में चल रही गतिविधियां निर्धारित नियमों के अनुरूप हैं या नहीं।
लोगों ने कथित अवैध उत्खनन, नदी के प्रवाह को प्रभावित करने, विस्फोटक के इस्तेमाल और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की जांच कर दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि पत्थर और निर्माण सामग्री की आवश्यकता अपनी जगह है, लेकिन इसके लिए नदी और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन नहीं होना चाहिए। यदि समय रहते नदी क्षेत्र में हो रही गतिविधियों की जांच नहीं की गई तो आने वाले समय में कोनार नदी के प्राकृतिक स्वरूप को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन, खनन विभाग और वन विभाग इन आरोपों को लेकर क्या कदम उठाते हैं और स्थल निरीक्षण के बाद कोनार नदी क्षेत्र में चल रहे पत्थर उत्खनन की वास्तविक स्थिति क्या सामने आती है।















