50 दिनों बाद विदेश से लौटा मनोज महतो का शव, कसियाडीह गांव में पसरा मातम

गोमिया। बेरमो अनुमंडल के गोमिया प्रखंड से रोजगार की तलाश में विदेश और महानगरों की ओर पलायन करने वाले मजदूरों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला गोमिया प्रखंड की बड़की सीधाबारा पंचायत अंतर्गत कसियाडीह गांव का है, जहां प्रवासी मजदूर मनोज कुमार महतो (43) का शव मौत के लगभग 50 दिनों बाद शुक्रवार देर शाम उसके पैतृक गांव पहुंचा। शव के गांव पहुंचते ही पूरे इलाके में मातम पसर गया। परिजनों की चीख-पुकार से माहौल गमगीन हो उठा। गांव के लोग देर रात तक मृतक के घर पहुंचकर शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाते रहे।
मनोज कुमार महतो, भैरव महतो और पेंगिया देवी के इकलौते पुत्र थे। वे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का एकमात्र सहारा थे। उनकी मौत ने पूरे परिवार को गहरे संकट में डाल दिया है। घटना के बाद से मृतक की पत्नी कौशल्या देवी, माता-पिता और इकलौते पुत्र धीरज कुमार महतो का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव में हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है कि आखिर स्वस्थ हालत में विदेश गए मनोज की अचानक मौत कैसे हो गई।
खुशियों के माहौल में आई मौत की खबर
परिजनों ने बताया कि घर में रामनवमी पूजा और उत्सव की तैयारियां चल रही थीं। घर में पकवान बनाए जा रहे थे और रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था। पूरा परिवार धार्मिक उत्साह और खुशी के माहौल में डूबा था। इसी बीच 27 मार्च की शाम विदेश से फोन आया कि मनोज कुमार महतो की मौत हो गई है।
यह खबर सुनते ही पूरे परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। कुछ ही मिनटों में उत्सव का माहौल मातम में बदल गया। परिजनों के अनुसार पहले किसी को इस खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ। परिवार बार-बार यही पूछता रहा कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है।
मृतक की पत्नी कौशल्या देवी ने बताया कि मनोज पूरी तरह स्वस्थ थे। विदेश जाने से पहले उन्होंने परिवार से कहा था कि कुछ महीनों तक मेहनत कर पैसे कमाकर घर की आर्थिक स्थिति सुधारेंगे। परिवार को यह उम्मीद थी कि विदेश से कमाई होने पर घर की स्थिति बेहतर होगी और अधूरे सपने पूरे होंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
8 मार्च को गया था अबूधाबी
परिजनों के अनुसार मनोज कुमार महतो 8 मार्च को रोजगार के सिलसिले में अबूधाबी गए थे। वहां वे बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी में मजदूरी का काम कर रहे थे। विदेश जाने के बाद वे लगातार परिवार के संपर्क में थे। कुछ दिन पहले ही उनकी घरवालों से बातचीत हुई थी और उन्होंने खुद को पूरी तरह स्वस्थ बताया था।
परिवार का कहना है कि विदेश जाने के बाद मनोज ने किसी तरह की परेशानी या बीमारी की जानकारी नहीं दी थी। ऐसे में अचानक मौत की खबर ने सभी को स्तब्ध कर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक उनकी मौत के कारणों का स्पष्ट खुलासा नहीं हो सका है।
मृतक की पत्नी कौशल्या देवी ने कहा कि आखिर किन परिस्थितियों में उनकी मौत हुई, इसकी सही जानकारी अब तक नहीं मिल पाई है। परिवार को केवल फोन पर मौत की सूचना दी गई थी। इससे परिजनों की बेचैनी और बढ़ गई है। गांव के लोग भी इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चा कर रहे हैं।
50 दिनों तक शव आने का इंतजार
मनोज की मौत के बाद परिवार को सबसे बड़ी परेशानी शव को भारत लाने में हुई। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार लगातार प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और एजेंसियों से संपर्क करता रहा। कागजी प्रक्रियाओं और विदेश से शव लाने की जटिल व्यवस्था के कारण शव आने में करीब 50 दिन लग गए।
इन 50 दिनों में परिवार हर दिन बेटे के शव का इंतजार करता रहा। मां पेंगिया देवी बार-बार दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी रहती थीं। पिता भैरव महतो भी बेटे की याद में टूट चुके हैं। गांव के लोगों का कहना है कि जिस परिवार ने बेटे को बेहतर भविष्य की उम्मीद में विदेश भेजा था, उसी बेटे का शव लौटने से पूरा गांव सदमे में है।
शुक्रवार देर शाम जब शव गांव पहुंचा तो बड़ी संख्या में ग्रामीण वहां जुट गए। हर आंख नम थी। अंतिम दर्शन के दौरान माहौल बेहद भावुक हो गया। महिलाओं की चीख-पुकार और परिजनों के क्रंदन से पूरा गांव गम में डूब गया।
पहले भी खो चुके हैं एक बेटा
इस परिवार की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती। मुखिया रितलाल महतो ने बताया कि भैरव महतो और पेंगिया देवी के एक अन्य पुत्र लुटन महतो की वर्ष 2011 में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उस हादसे के बाद मनोज ही परिवार का एकमात्र सहारा बचा था।
मनोज की कमाई से ही घर चलता था। माता-पिता की देखभाल, पत्नी और बेटे की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी। अब उनकी मौत के बाद परिवार पूरी तरह असहाय हो गया है। गांव के लोग भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आखिर अब परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा।
ग्रामीणों का कहना है कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण इलाके के युवाओं को मजबूर होकर विदेशों और दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाना पड़ता है। लेकिन कई बार ये मजदूर घर वापस नहीं लौट पाते। उनकी मौत की खबर ही परिवार तक पहुंचती है।
मुखिया ने जताया दुख
बड़की सीधाबारा पंचायत के मुखिया रितलाल महतो ने मनोज कुमार महतो की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह घटना बेहद दुखद और पीड़ादायक है। एक गरीब परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य चला गया, जिससे पूरा परिवार संकट में आ गया है।
उन्होंने कहा कि प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा को लेकर सरकार और प्रशासन को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। विदेशों और दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूरों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी जरूरी है ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
मुखिया ने शोक संतप्त परिवार को हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया और कहा कि गांव के लोग भी परिवार के साथ खड़े हैं।
गोमिया में लगातार बढ़ रहे प्रवासी मजदूरों की मौत के मामले
गोमिया और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी मजदूरों की मौत के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। रोजगार के अभाव में यहां के सैकड़ों युवा रोजी-रोटी की तलाश में महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु और खाड़ी देशों का रुख करते हैं।
लेकिन काम के दौरान दुर्घटना, बीमारी, तनाव, खराब कार्य परिस्थितियों और उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के कारण कई मजदूरों की मौत हो जाती है। कई मामलों में मौत के कारणों का स्पष्ट पता तक नहीं चल पाता। परिवारों को केवल सूचना मिलती है और फिर शव लाने की लंबी प्रक्रिया शुरू होती है।
ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने के कारण लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं। यदि गांव और प्रखंड स्तर पर रोजगार की बेहतर व्यवस्था हो, तो शायद लोगों को जान जोखिम में डालकर विदेश या दूर-दराज राज्यों में मजदूरी करने नहीं जाना पड़े।
गांव में पसरा सन्नाटा
मनोज कुमार महतो की मौत के बाद कसियाडीह गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मनोज मेहनती और मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति थे। वे हमेशा परिवार की जिम्मेदारियों को लेकर चिंतित रहते थे और बेहतर भविष्य के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे।
उनकी मौत ने न केवल परिवार बल्कि पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया है। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
मृतक का पुत्र धीरज कुमार महतो बार-बार अपने पिता को याद कर फूट-फूटकर रो रहा था। परिवार के लोगों को उसे संभालना मुश्किल हो रहा था। मां-पिता की हालत भी बेहद खराब बनी हुई है।
यह घटना एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को सामने लाती है कि रोजगार की तलाश में घर से दूर जाने वाले मजदूर किस तरह जोखिम भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर जाने वाले कई मजदूर कभी वापस जीवित नहीं लौटते और पीछे छोड़ जाते हैं रोता-बिलखता परिवार, अधूरे सपने और अनगिनत सवाल।















